एक प्रेमी
प्रेमिका से
करने आया था मुलाकात
“वेलेन्टाइन डे” की थी वो रात
प्रेमी ने प्रेमिका को था
कुछ ऐसे पकड़ा
मानो नन्हे शिशु को
माँ ने हो बांहों में जकड़ा
बिन बोले
आंखोँ में आंखें डाल
वो कर रहे थे
सार्थक मुलाकात
प्रेमिका बीच बीच में
अपने प्रेमी के
हाव भावों को थी तोलती
अंधेरे में जैसे
किसी वस्तु को टटोलती
तभी प्रेमी ने निकाल
एक कागज का पुर्जा
हौले से
प्रेमिका की ओर बढ़ाया
अपने मनोभावों को था
वह उसमें उतार लाया
थी चमक
आँखों में ऐसी
जैसे कुछ अनकहा
हो आज कहने आया
प्रेमिका ने
बड़ी नजाकत से
उस पु्र्जे को
उलट पुलट घुमाया
तेज निगाहों को
विषयवस्तु पर दौड़ाया
"दिल" "चाहत" प्यार" का
बस जिक्र उसमें पाया
था अफसोस
"आज के दिन" भी
वह खाली हाथ ही था आया
निराशा ने
कोमल मन को दुखाया
चंचल नयनोँ में
स्वतः जल भर आया
अपनी चिर परिचित अदा से
बंद होँठों को
पहली बार उसने हिलाया
और धीरे से
कुछ यूं बुदबुदाया
"कहती है दुनिया जिसे प्यार
बस एक हवा का
झोंका है
महसूस तो होता है
छूना चाहो तो धोखा है
कहने वाले ने
सच ही कहा है शायद
प्यार वो फूल है
जो हर दिल के
चमन में है खिलता
हैं वो खुशनसीब
जिनके प्यार को प्यार है मिलता
ना जाने कैसे
प्रेमी को
अचानक कुछ याद आया
छुपा कर रखा था
जो रहस्य अब तक
बंद हथेली में
प्रेमिका के पास लाया
खोली हथेली तो
हीरे की चमक से
चमकी प्रेमिका की आँखें
बोली वह कुछ शरमाकर
कितने बुद्धु हो
छुपा कर रखा था
जो यूं अपना प्यार
अब तक
खाओ कसम कि
फिर ना यूं
आँख मिचौली खेलोगे
जब भी आएगा
यह मुबारक दिन अबसे
यूं ही
मनमोहक अदा से
"ढाई आखर प्रेम का" बोलोगे
Wednesday, April 07, 2010
“ढाई आखर प्रेम का”
Monday, December 14, 2009
माँ की व्यथा
मेरी व्यथा
अनकही सही
अनजानी नहीं है
मुझ जैसी हजारों नारियों की
कहानी यही है.
जन्म से ही
खुद को
अबला जाना
जीवन के हर मोड़ पर
परिजनों ने ही
हेय माना.
थी कितनी प्रफुल्लित मैं
उस अनूठे अहसास से
रच बस रहा था जब
एक नन्हा अस्तित्व
मेरी सांसों की तारों में
प्रकृति के हर स्वर में
नया संगीत सुन रही थीअपनी ही धुन में
न जाने कितने
स्वप्न बुन रही थी
लम्बी अमावस के बाद
पू्र्णिमा का चांद आया
एक नन्हीं सी कली ने
मेरे आंगन को सजाया
आए सभी मित्रगण सम्बन्धी
कुछ के चेहरे थे लटके
तो कुछ के नेत्रों में
आँसू थे अटके
भांति भांति से
सभी थे समझाते
कभी देते सांत्वना
तो कभी पीठ थपथपाते
कुछ ने तो दबे शब्दों में
यह भी कह डाला
घबराओ नही
खुलेगा कभी
तुम्हारी किस्मत का भी ताला
लुप्त हुआ गौरव
खो गया आनन्द
अनजानी पीड़ा से यह सोचकर
बोझिल हुआ मन
क्या हुआ अपराध
जो ये सब मुझे कोसते हैं
दबे शब्दों में
मन की कटुता में
मिश्री घोलते हैं
काश ममता में होता साहस
माँ की व्यथा को शब्द मिल जाते
चीखकर मेरी नन्ही कली का
सबसे परिचय यूं कराते
न इसे हेय
न अबला जानो
खिलने दो खुशबू पहचानो
Monday, December 07, 2009
श्रद्धांजलि
वो कल की ही तो है बात
नहीँ बिछुड़ा था जब
तुम्हारा व मेरा साथ
वो तुम्हारा शान्त चेहरा
था जिस पर अनुशासन का पहरा
ना हँसना ना हँसाना
सदा कुछ ना कुछ सिखाना
कल ही तो खेले थे तुम
कुछ पल मुझ संग
मेरा रुठना
इठलाना
स्नेह से तुम्हारा मनाना
वो छिपकर कभी
मेरा तुम्हेँ सताना
फिर अगले ही पल
तुम्हारी विशाल बाँहोँ में
सिमट जाना
कल ही तो बीता है मेरा बचपन
देखा तब मैंने तुममेँ
एक नया ही अपनापन
हूई थी जीवन मेँ तभी
कुछ उपलब्धियाँ
पायी थी मैंने
तुमसे थपकियाँ
पायी थी मैंने
तुमसे थपकियाँ
वो कल ही तो हुई थी
मेरी विदाई
मेरी विदाई
हो चली जब मैँ पराई
की थी दूर तुमने
की थी दूर तुमने
खुद अपनी परछाई
सभी स्वजन गले मिले थे
दुख बन अश्रु
सभी के बहे थे
तुम दूर कहीं खड़े थे
मानो किसी
चिन्तन में पड़े थे
वो कल की ही तो है बात
नहीं बिछड़ा था
जब तुम्हारा व मेरा साथ
नहीं बिछड़ा था
जब तुम्हारा व मेरा साथ
सब कहते हैं कि
तुम अब नहीँ हो
पर मेरा मानना है कि
बन मेरा आदर्श
इस पल भी तुम यहीं हो
इस पल भी तुम यहीं हो
Monday, November 23, 2009
इंतजार
सोचते हैं कि ये हमने क्या किया
क्यूँ किसी बेवफा को दिल दिया
ताउम्र बिता दी
उसके इंतजार में
पल भर को भी
सपनों में
न जो मिला किया
लुटादी उसके प्यार में
हमने हर खुशी
जो हर गम से अपने
बेखबर बना रहा
हमने हर खुशी
जो हर गम से अपने
बेखबर बना रहा
किया इंतजार उस का
पल पल गिन कर
बड़ी बेरूखी से जिसने
सब कुछ भूला दिया
पल पल गिन कर
बड़ी बेरूखी से जिसने
सब कुछ भूला दिया
खुळी आँखों में सजाए
सपनें सजीले
इंतजार के नाम पर
फिर खुद से दगा किया
सपनें सजीले
इंतजार के नाम पर
फिर खुद से दगा किया
Tuesday, November 17, 2009
भ्रष्टाचार
मिला निमंत्रण
एक सभा से
आकर सभा को
सम्बोधित कीजिए
अपनी सरल व सुलझी
भाषा में
भ्रष्टाचार जैसी बुराई
पर कुछ बोलिए।
ऐसे सम्मान का था
ये प्रथम अवसर
गौरव के उल्लास में
हमने भी हामी भर दी
समस्या की गहनता को
बिना जाने समझे
हमने इक नादानी कर दी।
वाह वाही की चाह में
हमने सोचा
चलो भाषण की
रूप रेखा रच ले
अखबारों व पत्रिकाओं में
इस विषय में
जो कुछ छपा हो
सब रट लें।
जितना पढ़ते गए
विषय से हटते चले गएजो एक आध
मौलिक विचार थे भी
वो मिटते चले गए।
लगने लगा हमें
कि ये हमने क्या कर दिया
अभिमन्यु तो भाग्य से फँसा था
हमने चक्रव्यूह खुद रच लिया ।
देखते ही देखते
आ पहुँचा वो दिन
किसी अग्नि परीक्षा से
जो नही था अब भिन्न
तालियों की
गड़गड़हट से
हुआ हमारा अभिनंदन
घबराहट में र्धैय के टूटे सभी बंधन
हुआ हमारा अभिनंदन
घबराहट में र्धैय के टूटे सभी बंधन
ना जाने कैसे
रटा हुआ
सब भूल गए
रटा हुआ
सब भूल गए
कहना कुछ था
और कुछ कह गए।
और कुछ कह गए।
मन के किसी कोने में
छिपे उदगार बोल उठे
खुद को मासुम
व सम्पू्र्ण समाज को
व सम्पू्र्ण समाज को
भ्रष्ट बोल गए।
उस दोषारोपण ने
सभा का बदल दिया रंग
उभर आई भीड़
धीरे धीरे होने लगी कम।
उभर आई भीड़
धीरे धीरे होने लगी कम।
देखते ही देखते
वहाँ रह गए बस हम
और इस तरह
दुखद हुआ
उस महासभा का अंत
दुखद हुआ
उस महासभा का अंत
Monday, November 16, 2009
मत छुओ इन पलकों को
मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
भूल गई थीं
पथ ये अपना
चंचल सपनों संग
चिर मेल अपना
सपनों के कम्पन से
आज इनका सूनापन
मिटने दो।
मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
मूक व्यथा ने था
किया बसेरा
विरह घन ने था
इनको घेरा
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
भूल गई थीं
पथ ये अपना
चंचल सपनों संग
चिर मेल अपना
सपनों के कम्पन से
आज इनका सूनापन
मिटने दो।
मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
मूक व्यथा ने था
किया बसेरा
विरह घन ने था
इनको घेरा
दृग शिला को
बन जल-कण
आज बिखरने दो
मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
बन जल-कण
आज बिखरने दो
मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
युगों में बीते
विरह पल-छिन
तरसे दरस बिन
तृषित लोचन
उर सागर को
आज अमिट प्यास
हरने दो।
मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
Tuesday, September 01, 2009
वो रात फिर आ गई.........
घनघोर तम, निस्तेज तन
अनुपम छटा छा गई
नेह के मोती पिरोती
वो रात फिर आ गई
बिखरे पड़े घन केश
घुल रहा संताप है
प्रेम के नवगीत गाती
वो रात फिर आ गई
अलसित धरा ताके गगन
बस में नही चंचल मन
अम्बर धरा के मिलन की
वो रात फिर आ गई
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क्यों बन सुधि तुम समाए ह्रदय में....... क्यों बन सुधि तुम समाए ह्रदय में....... क्यों बन सुधि तुम समाए ह्रदय में....