Wednesday, November 01, 2017

लगता है अब मै बूढी होने लगी हूँ.....

घनी जुल्फों की सफेदी को कालक से  ढकने लगी हूँ
वजह बेवजह अब थकने लगी हूँ 
घर-बाहर भीड़ से कटने लगी हूँ 
लगता है अब मै बूढी होने लगी हूँ


घर पर अक्सर सभी से उलझने लगी हूँ 
बात-बेबात  बच्चों से  झगड़ने लगी हूँ 
अनहोनी के भय से  डरने लगी हूँ   
लगता है अब मै बूढी होने लगी हूँ


त्योहारों की चहल पहल से  सहमने लगी हूँ   
नाते-रिश्तेदारों से कटने लगी हूँ
दिखावा फरेब शायद समझने लगी हूँ 
लगता है अब मै बूढी होने लगी हूँ


बहुत कुछ अनदेखा करने लगी हूँ   
चलते-चलते अक्सर थमने लगी हूँ 
शायद अपने कमजोर दिल को समझने लगी हूँ     
लगता है अब मै बूढी होने लगी हूँ
  

कभी कभी अपने मन की भी अब सुनने लगी हूँ 
पल दो पल ही सही खुद से मिलने लगी हूँ 
दुनिया की शतरंजी शय मात से बचने लगी हूँ 
लगता है अब मै बूढी होने लगी हूँ
 

Thursday, November 24, 2016

                आज कल


समय के फेर में ना जाने ये क्या हो गया
आईने ने मेरा अक्स ही धो दिया

 अपनी ही परछाई से डरने लगी हूँ मैं
वो अनजान अजनबी सी बन गई है क्यूँ

जिस राह में सदियों से था मेरा  रोज आना जाना
वो गुमनाम गलियों सी  लगने लगी हैं क्यूँ

चाव से कहते थे हम जिसे अपना आशियाना
 हर दिवार उसकी हम पर हॅसने लगी है क्यूँ

 बदले जमाने की बदली है हवा ऐसी
हीरा भी काँच की चमक देता है आज क्यूँ

Tuesday, April 13, 2010

जुदाई


मिलन की चाह मेँ
जुदाई का
अपना है मजा
ये बात और है
सब माने इसे एक सजा

मिलन के नशे से भी
बड़ा है नशा जुदाई का
इसके उतरने की
अदा का
नहीँ है कोई पता

खोया खोया रहता है
जब मन
किसी की जुदाई मेँ
हर चेहरे पे
वही चेहरा
दिखाई देता है

हो अकेला
या फिर महफिल में
दिल है कि
बस उनके करीब रहता है

है मिलन मेँ मजा
तो इसमेँ बेकरारी है
वो सुबह है तो
ये रात घनी काली है

प्यार की राह के
ये मुसाफिर ऐसे
एक भी ना हो तो
वह सफर अधूरा है

इसका दामन है
सागर की लहरोँ जैसा
मिलन की आस के
मोतियोँ का है जिसमेँ डेरा

यूँ तो नहीँ
कोई थाह इसकी
फिर भी
हर किनारे पर
दिखता है मिलन का सवेरा




Wednesday, April 07, 2010

“ढाई आखर प्रेम का”


एक प्रेमी
प्रेमिका से
करने आया था मुलाकात
“वेलेन्टाइन डे” की थी वो रात
प्रेमी ने प्रेमिका को था
कुछ ऐसे पकड़ा
मानो नन्हे शिशु को
माँ ने हो बांहों में जकड़ा

बिन बोले
आंखोँ में आंखें डाल
वो कर रहे थे
सार्थक मुलाकात
प्रेमिका बीच बीच में
अपने प्रेमी के
हाव भावों को थी तोलती
अंधेरे में जैसे
किसी वस्तु को टटोलती

तभी प्रेमी ने निकाल
एक कागज का पुर्जा
हौले से
प्रेमिका की ओर बढ़ाया
अपने मनोभावों को था
वह उसमें उतार लाया
थी चमक
आँखों में ऐसी
जैसे कुछ अनकहा
हो आज कहने आया


प्रेमिका ने
बड़ी नजाकत से
उस पु्र्जे को
उलट पुलट घुमाया
तेज निगाहों को
विषयवस्तु पर दौड़ाया
"दिल" "चाहत" प्यार" का
बस जिक्र उसमें पाया
था अफसोस
"आज के दिन" भी
वह खाली हाथ ही था आया

निराशा ने
कोमल मन को दुखाया
चंचल नयनोँ में
स्वतः जल भर आया
अपनी चिर परिचित अदा से
बंद होँठों को
पहली बार उसने हिलाया
और धीरे से
कुछ यूं बुदबुदाया
"कहती है दुनिया जिसे प्यार
बस एक हवा का
झोंका है
महसूस तो होता है
छूना चाहो तो धोखा है
कहने वाले ने
सच ही कहा है शायद
प्यार वो फूल है
जो हर दिल के
चमन में है खिलता
हैं वो खुशनसीब
जिनके प्यार को प्यार है मिलता

ना जाने कैसे
प्रेमी को
अचानक कुछ याद आया
छुपा कर रखा था
जो रहस्य अब तक
बंद हथेली में
प्रेमिका के पास लाया

खोली हथेली तो
हीरे की चमक से
चमकी प्रेमिका की आँखें
बोली वह कुछ शरमाकर
कितने बुद्धु हो
छुपा कर रखा था
जो यूं अपना प्यार
अब तक
खाओ कसम कि
फिर ना यूं
आँख मिचौली खेलोगे
जब भी आएगा
यह मुबारक दिन अबसे
यूं ही
मनमोहक अदा से
"ढाई आखर प्रेम का" बोलोगे









Monday, December 14, 2009

माँ की व्यथा


मेरी व्यथा
अनकही सही
अनजानी नहीं है
मुझ जैसी हजारों नारियों की
कहानी यही है.

जन्म से ही
खुद को
अबला जाना
जीवन के हर मोड़ पर
परिजनों ने ही
हेय माना.

थी कितनी प्रफुल्लित मैं
उस अनूठे अहसास से
रच बस रहा था जब
एक नन्हा अस्तित्व
मेरी सांसों की तारों में

प्रकृति के हर स्वर में
नया संगीत सुन रही थीअपनी ही धुन में
न जाने कितने
स्वप्न बुन रही थी
लम्बी अमावस के बाद
पू्र्णिमा का चांद आया
एक नन्हीं सी कली ने
मेरे आंगन को सजाया

आए सभी मित्रगण‍ सम्बन्धी
कुछ के चेहरे थे लटके
तो कुछ के नेत्रों में
आँसू थे अटके

भांति भांति से
सभी थे समझाते
कभी देते सांत्वना
तो कभी पीठ थपथपाते

कुछ ने तो दबे शब्दों में
यह भी कह डाला
घबराओ नही
खुलेगा कभी
तुम्हारी किस्मत का भी ताला
लुप्त हुआ गौरव
खो गया आनन्द
अनजानी पीड़ा से यह सोचकर
बोझिल हुआ मन
क्या हुआ अपराध
जो ये सब मुझे कोसते हैं
दबे शब्दों में
मन की कटुता में
मिश्री घोलते हैं

काश ममता में होता साहस
माँ की व्यथा को शब्द मिल जाते
चीखकर मेरी नन्ही कली का
सबसे परिचय यूं कराते
न इसे हेय
न अबला जानो
खिलने दो खुशबू पहचानो

Monday, December 07, 2009

श्रद्धांजलि


वो कल की ही तो है बात

नहीँ बिछुड़ा था जब
तुम्हारा व मेरा साथ

वो तुम्हारा शान्त चेहरा
था जिस पर अनुशासन का पहरा
ना हँसना ना हँसाना
सदा कुछ ना कुछ सिखाना

कल ही तो खेले थे तुम
कुछ पल मुझ संग
मेरा रुठना
इठलाना
स्नेह से तुम्हारा मनाना
वो छिपकर कभी
मेरा तुम्हेँ सताना
फिर अगले ही पल
तुम्हारी विशाल बाँहोँ में
सिमट जाना

कल ही तो बीता है मेरा बचपन
देखा तब मैंने तुममेँ
एक नया ही अपनापन
हूई थी जीवन मेँ तभी
कुछ उपलब्धियाँ
पायी थी मैंने
तुमसे थपकियाँ
वो कल ही तो हुई थी
मेरी विदाई
हो चली जब मैँ पराई
की थी दूर तुमने
खुद अपनी परछाई

सभी स्वजन गले मिले थे
दुख बन अश्रु
सभी के बहे थे
तुम दूर कहीं खड़े थे
मानो किसी
चिन्तन में पड़े थे
वो कल की ही तो है बात
नहीं बिछड़ा था
जब तुम्हारा व मेरा साथ

सब कहते हैं कि
तुम अब नहीँ हो
पर मेरा मानना है कि
बन मेरा आदर्श
इस पल भी तुम यहीं हो
इस पल भी तुम यहीं हो

ओ पाहुन.....