अल्प विराम

Thursday, November 24, 2016

                आज कल


समय के फेर में ना जाने ये क्या हो गया
आईने ने मेरा अक्स ही धो दिया

अब अपनी ही परछाई से डरने लगी हूँ मैं
वो अनजान अजनबी सी बन गई है क्यूँ

जिस राह में सदियों से था मेरा  रोज आना जाना
वो गुमनाम गलियों सी  लगने लगी हैं अब

चाव से कहते थे हम जिसे अपना आशियाना
वहाँ दिवारों से बना बस एक मकान  रह गया है

बदले जमाने कि कुछ ऐसी  हवा चली कि
हीरा भी काँच की चमक देता है आज कल।

Saturday, August 27, 2016

"रोग अच्छे हैँ"

"रोग अच्छे हैँ"  यह कथन   सुनकर चकित होना निस्संदेह स्वभाविक है।  कई वर्षो पूर्व मधुमेह रोग   से पीड़ित एक व्यकि्त  ने अपने लेख में यह लिखा था कि "मैं भगवान को धन्यवाद  करता हूँ कि उनकी कृपा  से मुझे  यह रोग हुआ क्योकि  इस रोग ने मुझे सही अर्थों मे  अपने  आप से प्रेम करना सिखाया । इस रोग ने मुझे   अपने स्वास्थ्य का  ध्यान  रखते हुए एक स्वस्थ जीवनशैली  जीने  का पाठ पढ़ाया" । उस लेख को पढ़ने के बाद  बहुत समय  तक मैं यही विचार करती रही कि क्या वाकई  रोग होना किसी के लिए वरदान हो सकता है।   सच कहूँ तो मुझे वह लेख निराधार लगा क्योंकि उस लेख में दिए तर्क मेरी समझ  व परख से  परे थे। 
उस लेख को पढ़ने के कई वर्षों बाद, वर्ष २०१४ में मार्च माह में  मुझे अचानक अपने गले के बाई  तरफ  एक गांठ  अनुभव हुई। जांच के बाद पता चला कि  मुझे "लिम्फ  नोड टूबर्क्यलोसिस" हुआ है।  वैसे तो  टूबर्क्यलोसिस  मेरे भाषा बोध के  आधार पर कोई अनजाना शब्द नही था परन्तु इस रोग के प्रभाव व गम्भीरता  का अनुभव  जब हुआ तब अपने आप को  निराशा, दर्द, अवसाद के  एक ऐसे दुष्चक्र में  फँसा पाया जिससे निकलने में  डेढ़ वर्षो का लम्बा अन्तराल लग गया। इस रोग ने मुझे  शारीरिक तौर पर ही नही मानसिक स्तर पर भी बहुत गहरा आघात पहुंचाया।  भारी मात्रा में नौ माह तक ली गई दवाओं ने रोगमुक्त तो कर दिया परन्तु जल्द ही अपना दुष्प्रभाव भी दिखाना शुरू कर दिया।  मेरा वजन इन  डेढ़ वर्षो में ही लगभग १५ किलो बढ़ चुका था,  मोटापे के कारण मधुमेह रोग अपनी दस्तक दे चुका था।  थोडा सा चलने फिरने में ही मै हांफने लगती।  मुझे जल्द ही आने वाले एक नए  संकट का आभास होने लगा था।  अपने बच्चों को देखती तो लगता मुझे अपने लिए नही तो कम से कम इनके लिए अपने आप को स्वस्थ रखना होगा। परन्तु समझ नही पा रही थी कि क्या करुं  और कैसे करुं।  कहीं  दिल के किसी कोने में एक भय  बैठा था  कि अगर मैने समय रहते अपने लिए कुछ नही किया तो अब की बार कुछ ऐसा होगा जिससे उभरना शायद संभव ही ना हो।
 छोटे से कद के साथ ८० किलो वजन  होने के बाद भी  शरीर में अंदर से  बहुत कमजोरी बनी हुई थी। ऐसे में कुछ  भी विशेष करना मेरे  लिए  सम्भव नही था। मैने घर के पास ही कार्यालय से घर आने के बाद ७ से ८  बजे तक  एक हेल्थ ट्रेनर की देख रेख में हल्का फुल्का व्यायाम शुरू किया।  इतनी घातक बिमारी से उठने के चंद माह बाद ही,  कार्यालय में  दिन भर की थकान के बाद इस तरह  रात को  किसी हेल्थ ट्रेनर के पास जाना मेरे जानने वालों  को ही नही मेरे  परिवार के सदस्यों को भी बहुत  अटपटा लग रहा था।  परन्तु  मेरे पास  अपने शरीर में आ रहे विकारों पर काबू पाने के लिए  अपने वजन  को कम करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नही था। जल्द ही व्यायाम ने  शरीर पर  अपना   असर दिखाना शुरु कर   दिया था, परन्तु मानसिक स्तर पर एक अनजाना भय, अशांति अभी भी बनी हुई थी। जिसका मेरे पास अब भी कोई समाधान नही था। मन की शांति के लिए ध्यान के बारे में सुना बहुत था परन्तु   आधारभूत जानकारी के अभाव में कुछ भी करना  समय की बर्बादी था।  मेरी जिज्ञासा ने कब मुझे  विपाश्यना से जोड़ा  पता ही नही चला।  लगभग १८ माह के अथाह प्रयासों से मैंने १५ किलो वजन के साथ साथ एक ऐसी स्वस्थ जीवनशैळी को अपना लिया जिसमें किसी भी किस्म के भय, अशांति , नीरसता के लिए  आज कोई स्थान नही है। कुछ भी खाने से पहले आज मुझे खाद्य पदार्थों के स्वाद से अधिक उनकी गुणवत्ता प्रभावित करती है,  यही नही अब  शारीरिक कार्य मुझे थकान  नही अपितु  हमेशा  चुस्त बने  रहने  की प्रेरणा देता है ।
सच कहूँ तो आज बहुत विश्वास के साथ मैं यह कहना चाहती हूँ कि इतने वर्षो बाद   मुझे  सही अर्थों में उस लेख में लेखक के कहने का अभिप्राय समझ आया है। आज मैं भी  अपने अनुभव व विश्वास के साथ यह दोहराना चाहती हूँ कि जीवन में  आने वाले   रोग  हमे सचेत  करने के साथ साथ अपने शरीर के प्रति जागरूक होना सिखाते है। रोग हमे ध्यान की प्रक्रिया की भाँति ही अंतर्मुखी होकर अपने शरीर, अपने आप को समझने का अवसर देते हैं। इसलिए आज मैं भी यदि उस लेखक की  तरह यह कहूँ कि "रोग अच्छे होते हैं"  तो वह अतिशयोक्ति नही होगा।
 दीपा जोशी

Tuesday, April 13, 2010

जुदाई


मिलन की चाह मेँ
जुदाई का
अपना है मजा
ये बात और है
सब माने इसे एक सजा

मिलन के नशे से भी
बड़ा है नशा जुदाई का
इसके उतरने की
अदा का
नहीँ है कोई पता

खोया खोया रहता है
जब मन
किसी की जुदाई मेँ
हर चेहरे पे
वही चेहरा
दिखाई देता है

हो अकेला
या फिर महफिल में
दिल है कि
बस उनके करीब रहता है

है मिलन मेँ मजा
तो इसमेँ बेकरारी है
वो सुबह है तो
ये रात घनी काली है

प्यार की राह के
ये मुसाफिर ऐसे
एक भी ना हो तो
वह सफर अधूरा है

इसका दामन है
सागर की लहरोँ जैसा
मिलन की आस के
मोतियोँ का है जिसमेँ डेरा

यूँ तो नहीँ
कोई थाह इसकी
फिर भी
हर किनारे पर
दिखता है मिलन का सवेरा




Wednesday, April 07, 2010

“ढाई आखर प्रेम का”


एक प्रेमी
प्रेमिका से
करने आया था मुलाकात
“वेलेन्टाइन डे” की थी वो रात
प्रेमी ने प्रेमिका को था
कुछ ऐसे पकड़ा
मानो नन्हे शिशु को
माँ ने हो बांहों में जकड़ा

बिन बोले
आंखोँ में आंखें डाल
वो कर रहे थे
सार्थक मुलाकात
प्रेमिका बीच बीच में
अपने प्रेमी के
हाव भावों को थी तोलती
अंधेरे में जैसे
किसी वस्तु को टटोलती

तभी प्रेमी ने निकाल
एक कागज का पुर्जा
हौले से
प्रेमिका की ओर बढ़ाया
अपने मनोभावों को था
वह उसमें उतार लाया
थी चमक
आँखों में ऐसी
जैसे कुछ अनकहा
हो आज कहने आया


प्रेमिका ने
बड़ी नजाकत से
उस पु्र्जे को
उलट पुलट घुमाया
तेज निगाहों को
विषयवस्तु पर दौड़ाया
"दिल" "चाहत" प्यार" का
बस जिक्र उसमें पाया
था अफसोस
"आज के दिन" भी
वह खाली हाथ ही था आया

निराशा ने
कोमल मन को दुखाया
चंचल नयनोँ में
स्वतः जल भर आया
अपनी चिर परिचित अदा से
बंद होँठों को
पहली बार उसने हिलाया
और धीरे से
कुछ यूं बुदबुदाया
"कहती है दुनिया जिसे प्यार
बस एक हवा का
झोंका है
महसूस तो होता है
छूना चाहो तो धोखा है
कहने वाले ने
सच ही कहा है शायद
प्यार वो फूल है
जो हर दिल के
चमन में है खिलता
हैं वो खुशनसीब
जिनके प्यार को प्यार है मिलता

ना जाने कैसे
प्रेमी को
अचानक कुछ याद आया
छुपा कर रखा था
जो रहस्य अब तक
बंद हथेली में
प्रेमिका के पास लाया

खोली हथेली तो
हीरे की चमक से
चमकी प्रेमिका की आँखें
बोली वह कुछ शरमाकर
कितने बुद्धु हो
छुपा कर रखा था
जो यूं अपना प्यार
अब तक
खाओ कसम कि
फिर ना यूं
आँख मिचौली खेलोगे
जब भी आएगा
यह मुबारक दिन अबसे
यूं ही
मनमोहक अदा से
"ढाई आखर प्रेम का" बोलोगे









Monday, December 14, 2009

माँ की व्यथा


मेरी व्यथा
अनकही सही
अनजानी नहीं है
मुझ जैसी हजारों नारियों की
कहानी यही है.

जन्म से ही
खुद को
अबला जाना
जीवन के हर मोड़ पर
परिजनों ने ही
हेय माना.

थी कितनी प्रफुल्लित मैं
उस अनूठे अहसास से
रच बस रहा था जब
एक नन्हा अस्तित्व
मेरी सांसों की तारों में

प्रकृति के हर स्वर में
नया संगीत सुन रही थीअपनी ही धुन में
न जाने कितने
स्वप्न बुन रही थी
लम्बी अमावस के बाद
पू्र्णिमा का चांद आया
एक नन्हीं सी कली ने
मेरे आंगन को सजाया

आए सभी मित्रगण‍ सम्बन्धी
कुछ के चेहरे थे लटके
तो कुछ के नेत्रों में
आँसू थे अटके

भांति भांति से
सभी थे समझाते
कभी देते सांत्वना
तो कभी पीठ थपथपाते

कुछ ने तो दबे शब्दों में
यह भी कह डाला
घबराओ नही
खुलेगा कभी
तुम्हारी किस्मत का भी ताला
लुप्त हुआ गौरव
खो गया आनन्द
अनजानी पीड़ा से यह सोचकर
बोझिल हुआ मन
क्या हुआ अपराध
जो ये सब मुझे कोसते हैं
दबे शब्दों में
मन की कटुता में
मिश्री घोलते हैं

काश ममता में होता साहस
माँ की व्यथा को शब्द मिल जाते
चीखकर मेरी नन्ही कली का
सबसे परिचय यूं कराते
न इसे हेय
न अबला जानो
खिलने दो खुशबू पहचानो

Monday, December 07, 2009

श्रद्धांजलि


वो कल की ही तो है बात

नहीँ बिछुड़ा था जब
तुम्हारा व मेरा साथ

वो तुम्हारा शान्त चेहरा
था जिस पर अनुशासन का पहरा
ना हँसना ना हँसाना
सदा कुछ ना कुछ सिखाना

कल ही तो खेले थे तुम
कुछ पल मुझ संग
मेरा रुठना
इठलाना
स्नेह से तुम्हारा मनाना
वो छिपकर कभी
मेरा तुम्हेँ सताना
फिर अगले ही पल
तुम्हारी विशाल बाँहोँ में
सिमट जाना

कल ही तो बीता है मेरा बचपन
देखा तब मैंने तुममेँ
एक नया ही अपनापन
हूई थी जीवन मेँ तभी
कुछ उपलब्धियाँ
पायी थी मैंने
तुमसे थपकियाँ
वो कल ही तो हुई थी
मेरी विदाई
हो चली जब मैँ पराई
की थी दूर तुमने
खुद अपनी परछाई

सभी स्वजन गले मिले थे
दुख बन अश्रु
सभी के बहे थे
तुम दूर कहीं खड़े थे
मानो किसी
चिन्तन में पड़े थे
वो कल की ही तो है बात
नहीं बिछड़ा था
जब तुम्हारा व मेरा साथ

सब कहते हैं कि
तुम अब नहीँ हो
पर मेरा मानना है कि
बन मेरा आदर्श
इस पल भी तुम यहीं हो
इस पल भी तुम यहीं हो

Monday, November 23, 2009

इंतजार


सोचते हैं कि ये हमने क्या किया
क्यूँ किसी बेवफा को दिल दिया

ताउम्र बिता दी
उसके इंतजार में
पल भर को भी
सपनों में
न जो मिला किया
लुटादी उसके प्यार में
हमने हर खुशी
जो हर गम से अपने
बेखबर बना रहा
किया इंतजार उस का
पल पल गिन कर
बड़ी बेरूखी से जिसने
सब कुछ भूला दिया
खुळी आँखों में सजाए
सपनें सजीले
इंतजार के नाम पर
फिर खुद से दगा किया