अल्प विराम

Tuesday, November 17, 2009

भ्रष्टाचार


मिला निमंत्रण
एक सभा से
आकर सभा को
सम्बोधित कीजिए
अपनी सरल व सुलझी
भाषा में
भ्रष्टाचार जैसी बुराई
पर कुछ बोलिए।

ऐसे सम्मान का था
ये प्रथम अवसर
गौरव के उल्लास में
हमने भी हामी भर दी
समस्या की गहनता को
बिना जाने समझे
हमने इक नादानी कर दी।

वाह वाही की चाह में
हमने सोचा
चलो भाषण की
रूप रेखा रच ले
अखबारों व पत्रिकाओं में
इस विषय में
जो कुछ छपा हो
सब रट लें।

जितना पढ़ते गए
विषय से हटते चले गएजो एक आध
मौलिक विचार थे भी
वो मिटते चले गए।

लगने लगा हमें
कि ये हमने क्या कर दिया
अभिमन्यु तो भाग्य से फँसा था
हमने चक्रव्यूह खुद रच लिया ।

देखते ही देखते
आ पहुँचा वो दिन
किसी अग्नि परीक्षा से
जो नही था अब भिन्न
तालियों की
गड़गड़हट से
हुआ हमारा अभिनंदन
घबराहट में र्धैय के टूटे सभी बंधन
ना जाने कैसे
रटा हुआ
सब भूल गए
कहना कुछ था
और कुछ कह गए।

मन के किसी कोने में
छिपे उदगार बोल उठे
खुद को मासुम
व सम्पू्र्ण समाज को
भ्रष्ट बोल गए।

उस दोषारोपण ने
सभा का बदल दिया रंग
उभर आई भीड़
धीरे धीरे होने लगी कम।

देखते ही देखते
वहाँ रह गए बस हम
और इस तरह
दुखद हुआ
उस महासभा का अंत

Monday, November 16, 2009

मत छुओ इन पलकों को

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

भूल गई थीं
पथ ये अपना
चंचल सपनों संग
चिर मेल अपना
सपनों के कम्पन से
आज इनका सूनापन
मिटने दो।

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

मूक व्यथा ने था
किया बसेरा
विरह घन ने था
इनको घेरा
दृग शिला को
बन जल-कण
आज बिखरने दो

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

युगों में बीते
विरह पल-‍छिन
तरसे दरस बिन
तृषित लोचन
उर सागर को
आज अमिट प्यास
हरने दो।

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।











Tuesday, September 01, 2009

वो रात फिर आ गई.........


घनघोर तम, निस्तेज तन
अनुपम छटा छा गई
नेह के मोती पिरोती
वो रात फिर आ गई

बिखरे पड़े घन‍‍‌‍‍‍ केश
घुल रहा संताप है
प्रेम के नवगीत गाती
वो रात फिर आ गई

अलसित धरा ताके गगन
बस में नही चंचल मन
अम्बर धरा के मिलन की
वो रात फिर आ गई

Monday, January 12, 2009

तमन्ना

कभी यह होता तो कैसा होता .....

हम हर पल मुस्कुराते

वो आंसू बहाते

भूल जाते हम सभी वादे

वो हमारी याद में ख़ुद को भुलाते

कभी यह होता तो कैसा होता .....

हम हर पल महफिल सजाते

वो पथराई आंखों से करते इंतजार

रात भर हम सपनो में खोते

वो खुली आंखों से करते तारों से बात

कभी यह होता तो कैसा होता .....

हम बेखबर , अनजान बनते

वो आ आकर करते अपना हाल बया

हम देख कर भी अनदेखा करते

वो छिप छिप कर भरते आहें हर बार

Friday, November 28, 2008

स्पर्श


सिहर उठा उर सखी
पुलकित लधु प्राण है
मधुर‍ -मधुर सी इक कसक से
धुल रहा संताप है

पल्लवित हुआ जीवन कुसुम
बहे उन्मुक्त हर्ष‍‍‍ बयार है
नयनों की मधुशाला से
छलक -छलके खुमार है
दिशाएँ गा रहीं मिलन गीत
स्वनोँ मेँ जो आया मनमीत
छूकर अघरोँ से नयन दीप
कर गया व्याकुल ह्रदय अधीर

Monday, November 17, 2008

नम आँखेँ

(I)
चले थे भूलाने उनको
खुद को मिटा बैठे
बेखुदी मेँ यारों
अपना ही आशियाँ
जला बैठे


(II)
हर बार वही देखा
जो देखना चाहा
उनकी हर अदा को
हमने वफा जाना
भूल अपनी थी
जो बेवफा को
खुदा माना

(III)
होती थी जिसके आने से
मेरी सुबह शाम
क्या मालुम था वो चाँद
हर आंगन में निकला करता है

(IV)

उनको शिकायत है कि
हम हर बात में खफा होते हैं
कोई पूछे जाकर उनसे
वफा किसे कहते हैं


(V)
जाने कैसे दिल्लगी
दिल की लगी बन गई
क्योँ दे दोष उनको
भूल बेखुदी में
हमहीं से हो गई


(VI)
ना बन सके मेरे दामन की बहार
बन दर्द इस दिल में समा जाना
ना सुझे गर राह,
मिलने भी कभी मत आना
उखड़ने लगे जब "ये" साँस
बस एक झलक दिखा जाना

Friday, November 14, 2008

तेरा खत


हजारोँ पैगाम भेजे
तब इक जवाब आया
बरसोँ बाद
तेरी खुशबू से भरे
तेरे खत को
धड़कते दिल से
था हमने लगाया
हर मोती पर था
तेरी बेरूखी का साया
जिसके जोर ने
नम आँखोँ को भी
था आज पथराया
लिखा था तूने
"तुझको भूल जाँऊ
थी जो दिल्लगी
ना यू दिल से लगाऊँ
थी वो एक भूल
ना अब बुझी
आग सुलगाऊँ"
हजारोँ बार
तेरे खत को
इस बार भी पढ़ा हमने
अंदाज, लिखावट, खुशबू
सभी पहचाने पहचाने
से लगे
ना जाने क्यू
आज पहली बार
चाँद में
बस दाग ही दाग दिखे