वो रात फिर आ गई.........
घनघोर तम, निस्तेज तन
अनुपम छटा छा गई
नेह के मोती पिरोती
वो रात फिर आ गई
बिखरे पड़े घन केश
घुल रहा संताप है
प्रेम के नवगीत गाती
वो रात फिर आ गई
अलसित धरा ताके गगन
बस में नही चंचल मन
अम्बर धरा के मिलन की
वो रात फिर आ गई
घनघोर तम, निस्तेज तन
अनुपम छटा छा गई
नेह के मोती पिरोती
वो रात फिर आ गई
बिखरे पड़े घन केश
घुल रहा संताप है
प्रेम के नवगीत गाती
वो रात फिर आ गई
अलसित धरा ताके गगन
बस में नही चंचल मन
अम्बर धरा के मिलन की
वो रात फिर आ गई
तमन्ना
कभी यह होता तो कैसा होता .....
हम हर पल मुस्कुराते
वो आंसू बहाते
भूल जाते हम सभी वादे
वो हमारी याद में ख़ुद को भुलाते
कभी यह होता तो कैसा होता .....
हम हर पल महफिल सजाते
वो पथराई आंखों से करते इंतजार
रात भर हम सपनो में खोते
वो खुली आंखों से करते तारों से बात
कभी यह होता तो कैसा होता .....
हम बेखबर , अनजान बनते
वो आ आकर करते अपना हाल बया
हम देख कर भी अनदेखा करते
वो छिप छिप कर भरते आहें हर बार
(III)
होती थी जिसके आने से
मेरी सुबह शाम
क्या मालुम था वो चाँद
हर आंगन में निकला करता है
(IV)
उनको शिकायत है कि
हम हर बात में खफा होते हैं
कोई पूछे जाकर उनसे
वफा किसे कहते हैं
(V)
जाने कैसे दिल्लगी
दिल की लगी बन गई
क्योँ दे दोष उनको
भूल बेखुदी में
हमहीं से हो गई
(VI)
ना बन सके मेरे दामन की बहार
बन दर्द इस दिल में समा जाना
ना सुझे गर राह,
मिलने भी कभी मत आना
उखड़ने लगे जब "ये" साँस
बस एक झलक दिखा जाना