अल्प विराम

Thursday, March 24, 2005


आयी होली आयी

आयी होली आयी
बजने लगे
उमंग के साज
इन्द् धनुषीय रंगों से
रंग दो
पिया आज

न भाए रंग
अबीर का
न सोहे
रंग गुलाल
नेह के रंग से पिया
रंग दो
चुनरिया लाल

न जानूँ बात
सुरों की
है अनजानी
हर ताल
होली के मद में नाचूंगी
तुम संग
हो बेसुध बिन साज

बाट तुम्हारी
मैं जोहुंगी
नयन बिछाए
हर राह
भूल न जाना
बात मिलन की
आई होली आज

Saturday, March 12, 2005

मानव

ये कैसी डगर हैये कैसा सफ़र है
चले जा रहा है
बढ़े जा रहा है
ना कोई है साथी
ना ही हम सफ़र है
अकेले ना जाने कहां रहा है
कँटीली हैं राहें
ये बंजर चमन है
मरुभूमि तय किए जा रहा है
ना राह है कोई
ना मंजिल है दिखती
अन्धेरे में फिर भी
बढ़े जा रहा है
लहुलुहान तन है
चंचल मन है
अनदेखे कल से
डरे जा रहा है
पाने की आशा
खोने का भय है
इसी द्वंद में शायद जिए जा रहा है
तुम्हारा व मेरे प्रेम का इतिहास

सागर मंथन
निशब्द परलाप
अनकही वेदना
हिय से उठती आह

इन पिघलते एहसासों ने रचा
तुम्हारे व मेरे प्रेम का इतिहास

व्योम तकती आँखें
निरंतर परमाद
चिर संगिनी यादें
नीरव पलों का साथ

इन पिघलते एहसासों ने रचा
तुम्हारे व मेरे प्रेम का इतिहास

विरह यामिनी
निस्तेज pran
निस्पंद जीवन
विषाद सजल मन

इन पिघलते एहसासों ने रचा
तुम्हारे व मेरे प्रेम का इतिहास

अनकही पहेली
अनजानी तकरार
न आयी कभी बसंत
न देखी हमनें बहार

इन पिघलते एहसासों ने रचा
तुम्हारे व मेरे प्रेम का इतिहास