अल्प विराम

Tuesday, April 13, 2010

जुदाई


मिलन की चाह मेँ
जुदाई का
अपना है मजा
ये बात और है
सब माने इसे एक सजा

मिलन के नशे से भी
बड़ा है नशा जुदाई का
इसके उतरने की
अदा का
नहीँ है कोई पता

खोया खोया रहता है
जब मन
किसी की जुदाई मेँ
हर चेहरे पे
वही चेहरा
दिखाई देता है

हो अकेला
या फिर महफिल में
दिल है कि
बस उनके करीब रहता है

है मिलन मेँ मजा
तो इसमेँ बेकरारी है
वो सुबह है तो
ये रात घनी काली है

प्यार की राह के
ये मुसाफिर ऐसे
एक भी ना हो तो
वह सफर अधूरा है

इसका दामन है
सागर की लहरोँ जैसा
मिलन की आस के
मोतियोँ का है जिसमेँ डेरा

यूँ तो नहीँ
कोई थाह इसकी
फिर भी
हर किनारे पर
दिखता है मिलन का सवेरा




Wednesday, April 07, 2010

“ढाई आखर प्रेम का”


एक प्रेमी
प्रेमिका से
करने आया था मुलाकात
“वेलेन्टाइन डे” की थी वो रात
प्रेमी ने प्रेमिका को था
कुछ ऐसे पकड़ा
मानो नन्हे शिशु को
माँ ने हो बांहों में जकड़ा

बिन बोले
आंखोँ में आंखें डाल
वो कर रहे थे
सार्थक मुलाकात
प्रेमिका बीच बीच में
अपने प्रेमी के
हाव भावों को थी तोलती
अंधेरे में जैसे
किसी वस्तु को टटोलती

तभी प्रेमी ने निकाल
एक कागज का पुर्जा
हौले से
प्रेमिका की ओर बढ़ाया
अपने मनोभावों को था
वह उसमें उतार लाया
थी चमक
आँखों में ऐसी
जैसे कुछ अनकहा
हो आज कहने आया


प्रेमिका ने
बड़ी नजाकत से
उस पु्र्जे को
उलट पुलट घुमाया
तेज निगाहों को
विषयवस्तु पर दौड़ाया
"दिल" "चाहत" प्यार" का
बस जिक्र उसमें पाया
था अफसोस
"आज के दिन" भी
वह खाली हाथ ही था आया

निराशा ने
कोमल मन को दुखाया
चंचल नयनोँ में
स्वतः जल भर आया
अपनी चिर परिचित अदा से
बंद होँठों को
पहली बार उसने हिलाया
और धीरे से
कुछ यूं बुदबुदाया
"कहती है दुनिया जिसे प्यार
बस एक हवा का
झोंका है
महसूस तो होता है
छूना चाहो तो धोखा है
कहने वाले ने
सच ही कहा है शायद
प्यार वो फूल है
जो हर दिल के
चमन में है खिलता
हैं वो खुशनसीब
जिनके प्यार को प्यार है मिलता

ना जाने कैसे
प्रेमी को
अचानक कुछ याद आया
छुपा कर रखा था
जो रहस्य अब तक
बंद हथेली में
प्रेमिका के पास लाया

खोली हथेली तो
हीरे की चमक से
चमकी प्रेमिका की आँखें
बोली वह कुछ शरमाकर
कितने बुद्धु हो
छुपा कर रखा था
जो यूं अपना प्यार
अब तक
खाओ कसम कि
फिर ना यूं
आँख मिचौली खेलोगे
जब भी आएगा
यह मुबारक दिन अबसे
यूं ही
मनमोहक अदा से
"ढाई आखर प्रेम का" बोलोगे