अल्प विराम

Thursday, November 24, 2016

                आज कल


समय के फेर में ना जाने ये क्या हो गया
आईने ने मेरा अक्स ही धो दिया

अब अपनी ही परछाई से डरने लगी हूँ मैं
वो अनजान अजनबी सी बन गई है क्यूँ

जिस राह में सदियों से था मेरा  रोज आना जाना
वो गुमनाम गलियों सी  लगने लगी हैं अब

चाव से कहते थे हम जिसे अपना आशियाना
वहाँ दिवारों से बना बस एक मकान  रह गया है

बदले जमाने कि कुछ ऐसी  हवा चली कि
हीरा भी काँच की चमक देता है आज कल।