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Monday, March 31, 2008

पीङा

उभर गई उर की पीङा
सजल नयनन की पाती पर

ना सिमटी जब पलकों के आँचल
ढुलकी अधरों की प्‍याली पर

नेह का उपहार वो
प्रेम का वरदान थी
विकल तन के दामन में
वो, निश्‍चल मुस्‍कान थी
आँहों में इतिहास सजोया
स्‍मृतियों में पिरोए प्राण थे
सुने मन के रागों की
वो आलौकिक वीणा तान थी
निस्‍पंद उर की आस वो
बुझते दीपक की बाती थी
क्‍ँयू तोड बन्‍धन इस क्षितिज के
आज बह चली उस पार है००

Sunday, March 09, 2008

ये जिन्‍दगी....

अबूझ पहेली ये जिन्‍दगी

चले संग-संग लिए कई रंग

कभी आँगन दमके इन्‍द्रधनुष

छाये कभी घोर गहन तम

लगे कभी थमी -थमी

जैसे तना वितान गगन

बह चले कभी ऐसे

जैसे उन्‍मुक्‍त पवन

कभी उमंग की डोर पर

उड़ चले छूने घन

कभी बन मूक व्‍यथा

ढुलके, मिले रज-तन

सँ।सों के बंधन में

चली चले अपनी ही धुन

इक पल में थम जाए

छूटे जब सँ।सों का संग