अल्प विराम

Saturday, August 27, 2016

"रोग अच्छे हैँ"

"रोग अच्छे हैँ"  यह कथन   सुनकर चकित होना निस्संदेह स्वभाविक है।  कई वर्षो पूर्व मधुमेह रोग   से पीड़ित एक व्यकि्त  ने अपने लेख में यह लिखा था कि "मैं भगवान को धन्यवाद  करता हूँ कि उनकी कृपा  से मुझे  यह रोग हुआ क्योकि  इस रोग ने मुझे सही अर्थों मे  अपने  आप से प्रेम करना सिखाया । इस रोग ने मुझे   अपने स्वास्थ्य का  ध्यान  रखते हुए एक स्वस्थ जीवनशैली  जीने  का पाठ पढ़ाया" । उस लेख को पढ़ने के बाद  बहुत समय  तक मैं यही विचार करती रही कि क्या वाकई  रोग होना किसी के लिए वरदान हो सकता है।   सच कहूँ तो मुझे वह लेख निराधार लगा क्योंकि उस लेख में दिए तर्क मेरी समझ  व परख से  परे थे। 
उस लेख को पढ़ने के कई वर्षों बाद, वर्ष २०१४ में मार्च माह में  मुझे अचानक अपने गले के बाई  तरफ  एक गांठ  अनुभव हुई। जांच के बाद पता चला कि  मुझे "लिम्फ  नोड टूबर्क्यलोसिस" हुआ है।  वैसे तो  टूबर्क्यलोसिस  मेरे भाषा बोध के  आधार पर कोई अनजाना शब्द नही था परन्तु इस रोग के प्रभाव व गम्भीरता  का अनुभव  जब हुआ तब अपने आप को  निराशा, दर्द, अवसाद के  एक ऐसे दुष्चक्र में  फँसा पाया जिससे निकलने में  डेढ़ वर्षो का लम्बा अन्तराल लग गया। इस रोग ने मुझे  शारीरिक तौर पर ही नही मानसिक स्तर पर भी बहुत गहरा आघात पहुंचाया।  भारी मात्रा में नौ माह तक ली गई दवाओं ने रोगमुक्त तो कर दिया परन्तु जल्द ही अपना दुष्प्रभाव भी दिखाना शुरू कर दिया।  मेरा वजन इन  डेढ़ वर्षो में ही लगभग १५ किलो बढ़ चुका था,  मोटापे के कारण मधुमेह रोग अपनी दस्तक दे चुका था।  थोडा सा चलने फिरने में ही मै हांफने लगती।  मुझे जल्द ही आने वाले एक नए  संकट का आभास होने लगा था।  अपने बच्चों को देखती तो लगता मुझे अपने लिए नही तो कम से कम इनके लिए अपने आप को स्वस्थ रखना होगा। परन्तु समझ नही पा रही थी कि क्या करुं  और कैसे करुं।  कहीं  दिल के किसी कोने में एक भय  बैठा था  कि अगर मैने समय रहते अपने लिए कुछ नही किया तो अब की बार कुछ ऐसा होगा जिससे उभरना शायद संभव ही ना हो।
 छोटे से कद के साथ ८० किलो वजन  होने के बाद भी  शरीर में अंदर से  बहुत कमजोरी बनी हुई थी। ऐसे में कुछ  भी विशेष करना मेरे  लिए  सम्भव नही था। मैने घर के पास ही कार्यालय से घर आने के बाद ७ से ८  बजे तक  एक हेल्थ ट्रेनर की देख रेख में हल्का फुल्का व्यायाम शुरू किया।  इतनी घातक बिमारी से उठने के चंद माह बाद ही,  कार्यालय में  दिन भर की थकान के बाद इस तरह  रात को  किसी हेल्थ ट्रेनर के पास जाना मेरे जानने वालों  को ही नही मेरे  परिवार के सदस्यों को भी बहुत  अटपटा लग रहा था।  परन्तु  मेरे पास  अपने शरीर में आ रहे विकारों पर काबू पाने के लिए  अपने वजन  को कम करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नही था। जल्द ही व्यायाम ने  शरीर पर  अपना   असर दिखाना शुरु कर   दिया था, परन्तु मानसिक स्तर पर एक अनजाना भय, अशांति अभी भी बनी हुई थी। जिसका मेरे पास अब भी कोई समाधान नही था। मन की शांति के लिए ध्यान के बारे में सुना बहुत था परन्तु   आधारभूत जानकारी के अभाव में कुछ भी करना  समय की बर्बादी था।  मेरी जिज्ञासा ने कब मुझे  विपाश्यना से जोड़ा  पता ही नही चला।  लगभग १८ माह के अथाह प्रयासों से मैंने १५ किलो वजन के साथ साथ एक ऐसी स्वस्थ जीवनशैळी को अपना लिया जिसमें किसी भी किस्म के भय, अशांति , नीरसता के लिए  आज कोई स्थान नही है। कुछ भी खाने से पहले आज मुझे खाद्य पदार्थों के स्वाद से अधिक उनकी गुणवत्ता प्रभावित करती है,  यही नही अब  शारीरिक कार्य मुझे थकान  नही अपितु  हमेशा  चुस्त बने  रहने  की प्रेरणा देता है ।
सच कहूँ तो आज बहुत विश्वास के साथ मैं यह कहना चाहती हूँ कि इतने वर्षो बाद   मुझे  सही अर्थों में उस लेख में लेखक के कहने का अभिप्राय समझ आया है। आज मैं भी  अपने अनुभव व विश्वास के साथ यह दोहराना चाहती हूँ कि जीवन में  आने वाले   रोग  हमे सचेत  करने के साथ साथ अपने शरीर के प्रति जागरूक होना सिखाते है। रोग हमे ध्यान की प्रक्रिया की भाँति ही अंतर्मुखी होकर अपने शरीर, अपने आप को समझने का अवसर देते हैं। इसलिए आज मैं भी यदि उस लेखक की  तरह यह कहूँ कि "रोग अच्छे होते हैं"  तो वह अतिशयोक्ति नही होगा।
 दीपा जोशी