अल्प विराम

Sunday, March 09, 2008

ये जिन्‍दगी....

अबूझ पहेली ये जिन्‍दगी

चले संग-संग लिए कई रंग

कभी आँगन दमके इन्‍द्रधनुष

छाये कभी घोर गहन तम

लगे कभी थमी -थमी

जैसे तना वितान गगन

बह चले कभी ऐसे

जैसे उन्‍मुक्‍त पवन

कभी उमंग की डोर पर

उड़ चले छूने घन

कभी बन मूक व्‍यथा

ढुलके, मिले रज-तन

सँ।सों के बंधन में

चली चले अपनी ही धुन

इक पल में थम जाए

छूटे जब सँ।सों का संग


3 Comments:

  • At 2:22 AM, Blogger Monu said…

    Jeevan ki sacchi ragini, Anbujh paheli ko suljhaati falguni bayar......Uttam rachna ke liye badhayi..

     
  • At 6:35 AM, Blogger mehek said…

    bahut sundar

     
  • At 7:09 AM, Blogger DR M. R. JAIN said…

    Just Beautiful. Every word carries lot of meaning. Keep it up.
    Mohan

     

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