अल्प विराम

Saturday, March 12, 2005

मानव

ये कैसी डगर हैये कैसा सफ़र है
चले जा रहा है
बढ़े जा रहा है
ना कोई है साथी
ना ही हम सफ़र है
अकेले ना जाने कहां रहा है
कँटीली हैं राहें
ये बंजर चमन है
मरुभूमि तय किए जा रहा है
ना राह है कोई
ना मंजिल है दिखती
अन्धेरे में फिर भी
बढ़े जा रहा है
लहुलुहान तन है
चंचल मन है
अनदेखे कल से
डरे जा रहा है
पाने की आशा
खोने का भय है
इसी द्वंद में शायद जिए जा रहा है

3 Comments:

  • At 2:46 AM, Blogger Jitendra Chaudhary said…

    दीपा जी, आपने नये स्थान पर बनाये ब्लाग के लिये बधाई,
    आपके ब्लाग का टाइटिल अंग्रेजी मे है,
    हिन्दी मे "अल्पविराम" ज्यादा अच्छा लगेगा.

     
  • At 10:35 AM, Blogger Mahavir Sharma said…

    दीपा,
    प्रथम, मैं इतने सुन्दर ब्लाग के लिये अनेकानेक बधाई देता हूं। जहां तक इस कविता की
    बात है तो "मानव" ने मन जीत लिया। जीवन का वास्तविक स्वरूप दिया है। कवित्व की
    दृष्टि से देखें तो प्रवाह, उचित शब्दों का चयन, लयात्मकता - सभी गुण मिलते हैं। एक सुन्दर रचना है।
    शुभकामनाओं सहित
    महावीर शर्मा

     
  • At 12:07 PM, Blogger Vaibhav said…

    Deepaji,
    Good to see your blog.Just stopped by to "Hi!".Visit my blog sometime@
    http://kissay.rediffblogs.com

     

Post a Comment

<< Home