अल्प विराम

Monday, September 12, 2005

सूना जीवन

खो गए ओ घन कहाँ तुम
हो कहाँ किस देश में
पथरा गई कोमल धरा
चिर विरह की सेज में।

थी महक जिसमें समाई
तुम्हारे अचल प्रेम की
हुई तृषित वही वसुधा
विरहिणी के भेस में।

हो गए जो विरल घन तुम
सुधा निस्पंद हो गई
बसा पुलक धन उर में
चिर नींद में है सो गई।

लौट आओ तुम नीरधर
बन लघु पुराण विशेष
कह रहीं सूनी आँखें
बेसुध सुधा का संदेश।

3 Comments:

  • At 6:00 PM, Blogger अनूप शुक्ला said…

    अभी तो नीरधर मुंबई विचरण कर रहा है.कविता पढ़के अब आयेगा.काफी दिन बाद लिखा .जल्दी-जल्दी लिखा करें तो और अच्छा लगेगा.हिंदी दिवस पर कुछ और इनाम जीतने के लिये शुभकामनायें.

     
  • At 9:41 AM, Blogger Arun Kulkarni said…

    वर्षा तो अनेक प्रकार की हो सकती है, आप किस वर्षा की प्रतिक्षा कर रही है?
    निर, प्रेमसुधा या भक्तिरस? वैसे प्रेमसुधा और भक्तिरसमें जादा अंतर नही है | आशा करता हूँ कि जल्द ही आप आपके अभिप्सीत वर्षा से तृप्त हो जाएगी |
    आपने बहूत सुंदर कविता लिखी है |
    अरूण कुलकर्णी

     
  • At 9:41 AM, Blogger Arun Kulkarni said…

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