अल्प विराम

Monday, August 21, 2006

पाहुन

बिन परिचय
बिन आभास के
आया पाहुन जो पास
मघुर कसक सी
दे गया
निस्पंद उर में आज

व्‍याकुल थे
ळोचन युगो से
एक झलक पाने को
आन बसा वो
रोम रोम में
चिर तृष्‍णा मिटाने को

श्‍वास निश्‍वास की
डोर बंधे पल
कई युग बनाने को
रच बस गया
'वह' हृदय में
युगों का फेर मिटाने को

1 Comments:

  • At 11:51 AM, Blogger renu ahuja said…

    आपकी रचना पढ़ी सुंदर और प्रिय आगमन की अभिव्यक्ति लिए है, अंतत:-

    पाहुन तुम आज पधारे एसे हो,
    मरुभूमि में मधुबन सी सुहास अचानक जैसे हो,

    -रेणु आहूजा.

     

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