अल्प विराम

Tuesday, April 13, 2010

जुदाई


मिलन की चाह मेँ
जुदाई का
अपना है मजा
ये बात और है
सब माने इसे एक सजा

मिलन के नशे से भी
बड़ा है नशा जुदाई का
इसके उतरने की
अदा का
नहीँ है कोई पता

खोया खोया रहता है
जब मन
किसी की जुदाई मेँ
हर चेहरे पे
वही चेहरा
दिखाई देता है

हो अकेला
या फिर महफिल में
दिल है कि
बस उनके करीब रहता है

है मिलन मेँ मजा
तो इसमेँ बेकरारी है
वो सुबह है तो
ये रात घनी काली है

प्यार की राह के
ये मुसाफिर ऐसे
एक भी ना हो तो
वह सफर अधूरा है

इसका दामन है
सागर की लहरोँ जैसा
मिलन की आस के
मोतियोँ का है जिसमेँ डेरा

यूँ तो नहीँ
कोई थाह इसकी
फिर भी
हर किनारे पर
दिखता है मिलन का सवेरा




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