अल्प विराम

Thursday, November 10, 2005

वह एक फूल

खिला कहीं किसी चमन में
एक फूल सुन्दर
अनुपम थी उसकी आभा
विस्मयी थी उसकी रंगत

इतना सुगंधित कि
हर मन हर्षा जाता
अपने गुणों से
वह प्रकर्ति का उपहार था
कहलाता

ज्यों ज्यों समय बीता
वह पुष्प और महका
अपने सौन्दर्य से
उस बगिया का
केन्द्र बन बैठा

तभी एक रात
भयानक तूफान आया
अपने बल से जिसने
चट्टानों को भी सरकाया
तूफान के जोर को
वह फूल भी न सह पाया
पलक झपकते ही
धूल में जा समाया

मन चमन के दुर्भाग्य पर
पछताया
क्यों इतना सुन्दर कुसुम
वह न सम्भाल पाया
काल के जोर को
कोई
क्यूँ न थाम पाया

तभी चमन ने
अपनी महक से
जीवन का अर्थ समझाया
कुछ पल ही सही
उस कुसुम ने
चमन को महकाया
जब तक जिया
सभी के मन को लुभाया
अल्प ही सही
उसका जीवन सच्चा जीवन कहलाया

3 Comments:

  • At 10:23 PM, Blogger Durgesh Kumar Dubey said…

    Very nice poem carrying a complete philosophical message of shortlivedness of the life.
    "Siskiyon se bhari zindgi gaur-e- kabil na rahi.
    mujhe to bachpan ki woh nischal muskurahat hi yaad rahi."
    Keep writing. Good work.
    -Durgesh

     
  • At 10:07 PM, Blogger edwilliams0119 said…

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  • At 5:32 AM, Blogger Sachin Suryawanshi said…

    Wah!!!

    Aap ka tau jawab hee nahi...

     

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