अल्प विराम

Monday, February 13, 2006

“वैलनटाइन” बनाम “ बेलनटाइम”


था “वैलनटाइन” का जोर
थी धूम चारों ओर
अखबारों से चलचित्र तक
बस इसका ही था शोर

हर युवक का मन था
आनन्द विभोर
थी आशा शायद
इस बार जुड़ सके
मन की डोर

बताया एक मित्र ने
ये दिन है
दिल का हाल सुनाने का
दिल कि बात
दिल तक पहुँचाने का

बजने लगी जल तरंग
हमारे भी इस नीरस मन में
आया विचार देखें भला
क्या असर हैं इस दिन में

थी समस्या भला कैसे
‌‌‌ श्रीमती जी को यह बात समझाऍ
अपने बेताब दिल का
उन तक भी हाल पहुँचाऍ

उठायी कलम
लिख भेजी चार पंक्तियाँ
कुछ यूँ हमने

"यूँ तो प्यार नहीं मोहताज
किसी लम्हे का
दिल चाहता है कि तुम्हें
हर पल प्यार करूँ
सुना है "ये दिन" है
चाहने वालों का
सोचा क्यों ना
खुल के इजहार करूँ।

पढ हमारा प्रेम पत्र
उनका पारा चढ गया
घुमा बेलन हाथ में
बेरूखी से
ये भाषण जड़ दिया
"कहाँ से पाला है तुमने
ये प्रेम का भूत भला
भगवान जाने कैसे
जाएगी अब ये बला।

अरे ! करना ही था इजहार
अपने खातों का करते
मुझ अबला को
यूँ पाई पाई को
मोहताज ना करते।

था मुझसे गर प्यार
कुछ उपहार दिया होता
पिसी जा रही हूँ
इस चक्की में
कुछ उपाय किया होता।

जाओ इस अनर्गल प्रलाप से
ना मुझे सताओ
नहीं है कुछ काम
तो बाजार ही हो आओ।

मित्रों ! पकड़ लिए कान
उसी पल हमने
ना अब कभी
ये भूल दोहराऍगे
टूट जाए चाहे
ये शादी अपनी
"बेलनटाइम" ना अब
कभी मनाऍगे।

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