अल्प विराम

Wednesday, February 22, 2006

मत छुओ इन पलकों को

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

भूल गई थीं
पथ ये अपना
चंचल सपनों संग
चिर मेल अपना
सपनों के कम्पन से
आज इनका सूनापन
मिटने दो।

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

मूक व्यथा ने था
किया बसेरा
विरह घन ने था
इनको घेरा
drig- शिला को
बन जल-कण
आज बिखरने दो

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

युगों में बीते
विरह पल-‍छिन
तरसे दरस बिन
तRषित लोचन
उर सागर को आज
अमिट प्यास
हरने दो।

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

1 Comments:

  • At 1:42 PM, Blogger Sachin Suryawanshi said…

    Wah!!! bahut hee khibsoorati se likha hai... aapka jawaab hee nahi. I suggest you to write a book on this. I am sure you will get very famous. Keep it up. All the best.

     

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