अल्प विराम

Friday, December 15, 2006

पदचाप

स्‍मृति के पट से
उठ रहीं पदचाप हैं
चूमने जिन्‍हें फिर फिर
कोमल अधर बेताब है

थिरकती पुतलियों ने
किया आसव पान है
छोङ संग मूक वेदना
हो चली अनजान है

झंकृत जीवन वीणा पर
उर ने छेङी तान है
कामनाओं के इन्‍द्रधनुष से
लुप्‍त हुआ एकांत है

कह रही हर गूँज
गल रहा संताप है
विरह-निशि के बाद
देखो ! मधुर मिलन अब पास है

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