Friday, December 15, 2006

पदचाप

स्‍मृति के पट से
उठ रहीं पदचाप हैं
चूमने जिन्‍हें फिर फिर
कोमल अधर बेताब है

थिरकती पुतलियों ने
किया आसव पान है
छोङ संग मूक वेदना
हो चली अनजान है

झंकृत जीवन वीणा पर
उर ने छेङी तान है
कामनाओं के इन्‍द्रधनुष से
लुप्‍त हुआ एकांत है

कह रही हर गूँज
गल रहा संताप है
विरह-निशि के बाद
देखो ! मधुर मिलन अब पास है

2 comments:

Indra Darshan said...

DeepaJee,
Really this is a wonderful gem from your treasure. Both the rhythem as well as the flow are tremendous.
Heartiest Congratulations on this marvellous creation.
umesh vyas

मोहिन्दर कुमार said...

nice potrait drawn of "Judai" and "Milan"......
impressive one.