अल्प विराम

Tuesday, September 01, 2009

वो रात फिर आ गई.........


घनघोर तम, निस्तेज तन
अनुपम छटा छा गई
नेह के मोती पिरोती
वो रात फिर आ गई

बिखरे पड़े घन‍‍‌‍‍‍ केश
घुल रहा संताप है
प्रेम के नवगीत गाती
वो रात फिर आ गई

अलसित धरा ताके गगन
बस में नही चंचल मन
अम्बर धरा के मिलन की
वो रात फिर आ गई

6 Comments:

Post a Comment

<< Home