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Monday, November 16, 2009

मत छुओ इन पलकों को

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

भूल गई थीं
पथ ये अपना
चंचल सपनों संग
चिर मेल अपना
सपनों के कम्पन से
आज इनका सूनापन
मिटने दो।

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

मूक व्यथा ने था
किया बसेरा
विरह घन ने था
इनको घेरा
दृग शिला को
बन जल-कण
आज बिखरने दो

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।

युगों में बीते
विरह पल-‍छिन
तरसे दरस बिन
तृषित लोचन
उर सागर को
आज अमिट प्यास
हरने दो।

मत छुओ इन पलकों को
बन अश्रु पीड़ा बहने दो।











2 comments:

  1. व्यथित कर देने वाली विरह वेदना

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  2. मूक व्यथा ने था
    किया बसेरा
    विरह घन ने था
    इनको घेरा
    दृग शिला को
    बन जल-कण
    आज बिखरने दो

    मत छुओ इन पलकों को
    बन अश्रु पीड़ा बहने दो।
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

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